**दिल्ली अच्छे बीते 5 साल, पर रैन बसेरा आज भी बेहाल** दिल्ली क्राईम रिपोर्टर भवेश पिपलिया की रिपोर्ट जी हा, आपने सही समझा, हम बात कर रहे है दिल्ली के रैन बसेरे की,डूसिब की वेब साइट के अनुसार दिल्ली में कुल मिलाकर 234 रैन बसेरा है,जिनमे 78 आरसीसी बिल्डिंग,115 पोर्टा केबिन और 41 टेंट है,सभी रैन बसेरे की कुल क्षमता 18538 है, परंतु कई रैन बसेरा खली रहता है, कुल मिलकर रोजाना रैन बसेरे में सोने वाले 10000 से 13000 के आस पास होते है, तो कही न कही रैन बसेरा खली सा नजर आता है,जब हमारे द्वारा बहार सड़क पर रहने वाले लोगो से पूछा गया तो किसी ने जगह की कमी बताई,किसी ने केयरटेकर का असभ्य वर्तन बताया,किसी ने कम्बल से बदबू की शिकायत की,कुल मिलकर सभी ने रैन बसेरे में न जाने के कुछ न कुछ कारण बताया, बाद में हमने कुछ केयर टेकर से भी बात की,उनको सड़क पर रहने वाले लोगो के बारे में पूछा गया तब हमने बिलकुल अलग ही पाया, केयर टेकर ने बताया ये लोग कम्बल के लिए बहार सोते है,और भीख भी मांगते है,जिनसे उनकी दिन भर की जरूरते परिपूर्ण होती है,जब हमने ज्यादा जानकारी ली तब पाया की कही न कही शासन, प्रशासन और रैन बसेरे का संचालन करने वाली संस्था की भी नज़रअंदाजी देखने को मिली,संस्थाओ द्वारा इस बार बहुत कम प्रयास किया होगा की बेघरों को रैन बसेरे में लेजाया जाए, डूसिब की 17 रेस्क्यू टीम होने के बावजूद रैन बसेरा खली हो तो कही न कही बेदारकारी नजर आती है, एक व्यक्ति ने अपना नाम न बताने की शर्त पर बताया की रेस्क्यू टीम रात को सामान की { कम्बल और रैन बसेरे का उपयोगी सामान } आप ले रेस्क्यू वाहन से भी करती है,रेस्क्यू का समय रात 10 से सुबह 4 बजे तक का होता है पर ज्यादा तर रेस्क्यू वाहन 4-5 घंटे भी समय नहीं देते,पर इनकी निगरानी करने वाला कोई नहीं है,वाहन में कोई जीपीएस सिस्टम भी नहीँ है की सभी वाहन की निगरानी की जा सके, डूसिब की वेब साइट अनुसार शीतकालीन योजना 2019-20 अंतर्गत अब तक 41 टेंट लगाये गए है,परंतु ज्यादातर टेंट में बुनयादी सुविधा की बहुत कमी नज़र आती है, कई टेंट पर बिजली की सुविधा ही नहीँ है, वहां चार्जिंग लैंप का उपयोग किया जाता है,जो की मुश्किल से 2-3 घंटे तक ही चल पाती है,बाकि का समय बेघर अँधेरे में बिताते है,कुछ टेंट के आस पास बहुत गंदकी नजर आयी,कई टेंट में पीने के पानी का भी आभाव है, कही उपयोग करने योग्य पानी का भी आभाव है,कई जगह पर टॉयलेट और बाथरूम की भी सुविधा नही है,रैन बसेरे में रहती महिला खुले में नाहने को मजबूर है, आज हमने दिल्ली के कुछ क्षेत्र के रैन बसेरे का दौरा किया,जिनमे सराई काले खां में NS – 613,572 में पाया की बिजली की सुविधा नहीँ थी, चार्जिंग लैंप से अपना गुजारा कर रहे है,इस टेंट के आस पास भी हमने काफी परिवार को सड़क पर रहते हुए पाया, निजामुद्दीन ब्रिज के पास NS -539,557 में पीने का और उपयोग करने का पानी नहीँ था,जब हमने मौजूद केयर टेकर को पानी की समस्या के बारे में पूछा तो उसने बताया की यहाँ पानी नही आता, हररोज हमे कही से पानी लाना पड़ता है, दिल्ली जल बोर्ड की गाड़ी भी नही आती,पानी लाने के लिए काफी मसक्क्त करनी पड़ती है, हमने इस बारे में कई बार हमारे अधिकारी को बताया पर अभी तक कोई सुविधा नही हुई, हमने संत नगर और नेहरू पैलेस के रैन बसेरे में भी दौरा किया, नेहरू पैलेस वाले रैन बसेरे के पास सड़क पर हमने दसो परिवार को देखा, जिनमे छोटे बच्चे भी थे, हमने उनसे रैन बसेरे में न जाने का कारण जानने की कोशिश की पर किसीने भी सचोट जवाब नही दिया, इस दौरान हमने पाया की कुछ जगह पर संस्था के कर्मचारी की रैन बसेरे के प्रति नज़रअंदाजी और लापरवाही के कारण शैलटर परिसर में लोग खुले आम शराब और गांजा पीते भी दिखे,कही न कही डूसिब की भी लापरवाही के कारण रैन बसेरे बेहाल हो चुके है, दिल्ली के ज्यादातर रैन बसेरे दिव्यांग जन के लिए दुविधाजनक है, जिनकी वहज से दिल्ली में रहने वाले दिव्यांग बेघर सड़क पर रहने को मजबूर है,दिल्ली सरकार द्वारा बताया जाता है की रैन बसेरे बहुत अच्छे कर दिए है और बेघर लोगो को सम्मान और सुरक्षित जीवन देते है,पर दिल्ली सरकार का ये दावा कही ना कही बेबुनियाद नज़र आता है जिस रैन बसेरे में बुनियादी सुविधा का आभाव हो ,वहां कैसा सुरक्षित जीवन मिल सकता है?? बेघर के जीवन में आज भी कोई सुधर नही हुवा है,आज भी सड़क पर रहने को मजबूर है, रैन बसेरे में रहते बेघर भी वहाँ से निकाल ना दे इसके चलते कई छोटी मोटी समस्या से समजौता करते है, आउटलुक न्यूज़ के अनुसार 24.DEC.2019 को बिपिन राय ने कहा था 1 जनवरी 2020 से सभी रैन बसेरे में चाय और रस्क देने की योजना बना रहे है, परंतु आज तक एक भी रैन बसेरे में चाय और रस्क नही दिया गया,10 जनवरी 2020 को अरविन्द केजरीवाल ने ट्वीट किया था की पहले लोग खुले आसमान के निचे सोते थे, कई लोगो की ठण्ड में मौत हो जाती थी,हमने सभी रैन बसेरे बहुत अच्छे कर दिए,पर अरविन्द केजरीवाल का ये दावा बेबुनियाद है, शैलटर होम में आज भी प्राथमिक सुविधा नही है। bsp24news 6264105390

**दिल्ली अच्छे बीते 5 साल, पर रैन बसेरा आज भी बेहाल** दिल्ली क्राईम रिपोर्टर भवेश पिपलिया की रिपोर्ट जी हा, आपने सही समझा, हम बात कर रहे है दिल्ली के रैन बसेरे की,डूसिब की वेब साइट के अनुसार दिल्ली में कुल मिलाकर 234 रैन बसेरा है,जिनमे 78 आरसीसी बिल्डिंग,115 पोर्टा केबिन और 41 टेंट है,सभी रैन बसेरे की कुल क्षमता 18538 है, परंतु कई रैन बसेरा खली रहता है, कुल मिलकर रोजाना रैन बसेरे में सोने वाले 10000 से 13000 के आस पास होते है, तो कही न कही रैन बसेरा खली सा नजर आता है,जब हमारे द्वारा बहार सड़क पर रहने वाले लोगो से पूछा गया तो किसी ने जगह की कमी बताई,किसी ने केयरटेकर का असभ्य वर्तन बताया,किसी ने कम्बल से बदबू की शिकायत की,कुल मिलकर सभी ने रैन बसेरे में न जाने के कुछ न कुछ कारण बताया, बाद में हमने कुछ केयर टेकर से भी बात की,उनको सड़क पर रहने वाले लोगो के बारे में पूछा गया तब हमने बिलकुल अलग ही पाया, केयर टेकर ने बताया ये लोग कम्बल के लिए बहार सोते है,और भीख भी मांगते है,जिनसे उनकी दिन भर की जरूरते परिपूर्ण होती है,जब हमने ज्यादा जानकारी ली तब पाया की कही न कही शासन, प्रशासन और रैन बसेरे का संचालन करने वाली संस्था की भी नज़रअंदाजी देखने को मिली,संस्थाओ द्वारा इस बार बहुत कम प्रयास किया होगा की बेघरों को रैन बसेरे में लेजाया जाए, डूसिब की 17 रेस्क्यू टीम होने के बावजूद रैन बसेरा खली हो तो कही न कही बेदारकारी नजर आती है, एक व्यक्ति ने अपना नाम न बताने की शर्त पर बताया की रेस्क्यू टीम रात को सामान की { कम्बल और रैन बसेरे का उपयोगी सामान } आप ले रेस्क्यू वाहन से भी करती है,रेस्क्यू का समय रात 10 से सुबह 4 बजे तक का होता है पर ज्यादा तर रेस्क्यू वाहन 4-5 घंटे भी समय नहीं देते,पर इनकी निगरानी करने वाला कोई नहीं है,वाहन में कोई जीपीएस सिस्टम भी नहीँ है की सभी वाहन की निगरानी की जा सके, डूसिब की वेब साइट अनुसार शीतकालीन योजना 2019-20 अंतर्गत अब तक 41 टेंट लगाये गए है,परंतु ज्यादातर टेंट में बुनयादी सुविधा की बहुत कमी नज़र आती है, कई टेंट पर बिजली की सुविधा ही नहीँ है, वहां चार्जिंग लैंप का उपयोग किया जाता है,जो की मुश्किल से 2-3 घंटे तक ही चल पाती है,बाकि का समय बेघर अँधेरे में बिताते है,कुछ टेंट के आस पास बहुत गंदकी नजर आयी,कई टेंट में पीने के पानी का भी आभाव है, कही उपयोग करने योग्य पानी का भी आभाव है,कई जगह पर टॉयलेट और बाथरूम की भी सुविधा नही है,रैन बसेरे में रहती महिला खुले में नाहने को मजबूर है, आज हमने दिल्ली के कुछ क्षेत्र के रैन बसेरे का दौरा किया,जिनमे सराई काले खां में NS – 613,572 में पाया की बिजली की सुविधा नहीँ थी, चार्जिंग लैंप से अपना गुजारा कर रहे है,इस टेंट के आस पास भी हमने काफी परिवार को सड़क पर रहते हुए पाया, निजामुद्दीन ब्रिज के पास NS -539,557 में पीने का और उपयोग करने का पानी नहीँ था,जब हमने मौजूद केयर टेकर को पानी की समस्या के बारे में पूछा तो उसने बताया की यहाँ पानी नही आता, हररोज हमे कही से पानी लाना पड़ता है, दिल्ली जल बोर्ड की गाड़ी भी नही आती,पानी लाने के लिए काफी मसक्क्त करनी पड़ती है, हमने इस बारे में कई बार हमारे अधिकारी को बताया पर अभी तक कोई सुविधा नही हुई, हमने संत नगर और नेहरू पैलेस के रैन बसेरे में भी दौरा किया, नेहरू पैलेस वाले रैन बसेरे के पास सड़क पर हमने दसो परिवार को देखा, जिनमे छोटे बच्चे भी थे, हमने उनसे रैन बसेरे में न जाने का कारण जानने की कोशिश की पर किसीने भी सचोट जवाब नही दिया, इस दौरान हमने पाया की कुछ जगह पर संस्था के कर्मचारी की रैन बसेरे के प्रति नज़रअंदाजी और लापरवाही के कारण शैलटर परिसर में लोग खुले आम शराब और गांजा पीते भी दिखे,कही न कही डूसिब की भी लापरवाही के कारण रैन बसेरे बेहाल हो चुके है, दिल्ली के ज्यादातर रैन बसेरे दिव्यांग जन के लिए दुविधाजनक है, जिनकी वहज से दिल्ली में रहने वाले दिव्यांग बेघर सड़क पर रहने को मजबूर है,दिल्ली सरकार द्वारा बताया जाता है की रैन बसेरे बहुत अच्छे कर दिए है और बेघर लोगो को सम्मान और सुरक्षित जीवन देते है,पर दिल्ली सरकार का ये दावा कही ना कही बेबुनियाद नज़र आता है जिस रैन बसेरे में बुनियादी सुविधा का आभाव हो ,वहां कैसा सुरक्षित जीवन मिल सकता है?? बेघर के जीवन में आज भी कोई सुधर नही हुवा है,आज भी सड़क पर रहने को मजबूर है, रैन बसेरे में रहते बेघर भी वहाँ से निकाल ना दे इसके चलते कई छोटी मोटी समस्या से समजौता करते है, आउटलुक न्यूज़ के अनुसार 24.DEC.2019 को बिपिन राय ने कहा था 1 जनवरी 2020 से सभी रैन बसेरे में चाय और रस्क देने की योजना बना रहे है, परंतु आज तक एक भी रैन बसेरे में चाय और रस्क नही दिया गया,10 जनवरी 2020 को अरविन्द केजरीवाल ने ट्वीट किया था की पहले लोग खुले आसमान के निचे सोते थे, कई लोगो की ठण्ड में मौत हो जाती थी,हमने सभी रैन बसेरे बहुत अच्छे कर दिए,पर अरविन्द केजरीवाल का ये दावा बेबुनियाद है, शैलटर होम में आज भी प्राथमिक सुविधा नही है। bsp24news 6264105390

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