*आरएसएस ने कभी भारत के संविधान और तिरंगा का सम्मान नहीं किया*” *श्रीधर शर्मा प्रदेश सचिव मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी*(राष्ट्रीय वस्थापक नीलेश जैन की खास रिपोर्ट)
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा के नेता जनता के बीच फूट डालने और उन्माद फैलाने का काम करते हैं लेकिन संविधान को मानने का दिखावा करते हैं। भाजपा के प्रवक्ता टी.वी. चैनलों पर संविधान की रट लगाते हैं, संविधान के अनुसार गठित सुप्रीम कोर्ट की दुहाई देते हैं मगर सच तो यह है कि आरएसएस को भारत के संविधान से नफरत है।
*संघ संविधान से अपनी असहमतियां तार्किक आधार पर नहीं रखता है क्योंकि तर्क से तो संघ का छत्तीस का आँकड़ा है। अतार्किकता पर ही उसने नफरत का धंधा खड़ा किया है। संघ के संविधान विरोध का आधार उसका झूठा प्राचीनता का बहाना है जिसके अनुसार प्राचीन काल में ‘स्वर्ण युग’ था जबकि ऐतिहासिक सत्यता इस बात को कहीं भी प्रमाणित नहीं करते हैं।जब से संविधान लागू हुआ तब से आरएसएस के प्रमुख नेताओं ने उसका विरोध ही किया है। एक तरफ संघ अतार्किक रूप से संविधान को अप्रश्नेय और पवित्र-पूज्य बनाने की मनोवृत्ति का प्रचार करता है। दूसरी तरफ उसके नेताओं के मन में एक तानाशाही पूर्ण व्यवस्था का सपना है जहां जनवाद, आधुनिक मूल्यों और समानता जैसे विचार हैं ही नहीं।वैसे तो भारतीय संविधान के बनने की प्रक्रिया में ही जनवाद का पालन नहीं किया गया। 11.5% मताधिकार के आधार पर गठित कमिटी के द्वारा 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इण्डिया एक्ट को काट-छांट कर इसे बनाया गया। आज़ाद भारत में वयस्क मताधिकार के आधार पर संविधान सभा बुलाने का वादा आज तक पूरा नहीं हुआ है।एक ओर जहां भारतीय संविधान जनता को कुछ जनवादी अधिकार देने का प्रावधान रखता है वहीं दूसरे हाथ से उन्हें छीन लेने के अधिकार भी इसमें दिए गए हैं। भारत में इमरजेंसी भी संविधान के अनुसार ही लगाया गया था।यह संविधान सम्पत्ति की सुरक्षा मुहैया करता है। पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली और श्रम के शोषण की लूट इसी संविधान के ढांचे में अविराम जारी है। निजी सम्पत्ति का रक्षक यह संविधान तमाम विचित्रताएं और अंतरविरोधपूर्ण वक्तव्यों को अपने अंदर समाए हुए है। भारतीय मेहनतकश जनता के हितों को देखते हुए यह अपर्याप्त है। लेकिन आरएसएस इससे बेहतर विकल्प सुझाने की जगह पूरे इतिहास चक्र को पीछे ले जाना चाहता है।। bsp24news सत्यता की पहचान हमारा हिंदुस्तान 6264105390