अमरकंटक : श्रवण उपाध्याय (पत्रकार)
पवित्र नगरी अमरकंटक में लोग अपने पूर्वजो के प्रति श्राद्ध कर्म , तर्पण के लिए भारी संख्या में हर वर्ष पहुचते है । अमरकंटक में लोग पंडितों के सानिध्य में नर्मदा नदी , नर्मदा कुंड व अरंडी संगम नर्मदा तट पर तर्पण , कर्मकांड का विधि विधान से श्राद्ध पहुच कर लोग करते है ।
अपने पूर्वजो के प्रति अर्पण , तर्पण व समर्पण का पखवाड़ा अश्विनी मास के पूर्णिमा तिथि से श्राद्ध कर्म प्रारम्भ हो जाता है जो कि अश्विनी मास के पितृमोक्ष अमावस्या या स्नान दान श्राद्ध अमावस्या तक माना जाता है । जो परिवार में शांति व सुख के लिए पितृपक्ष का विशेष महात्म्य है । यह श्राद्ध कार्यक्रम पूरे पखवाड़े भर चलता है । श्राद्ध का मतलब अपने सभी कुल देवताओं और पितरों के प्रति श्रद्धा प्रगट करना है । पंडितों का यह भी कहना है कि प्रत्येक महीने की अमावस्या तिथि को पितरों की शांति के लिए पिंडदान य फिर श्राद्ध कर्म किये जा सकते है । लेकिन पितृपक्ष में श्राद्ध करने का विशेष महत्व माना जाता है । नर्मदा मंदिर पुजारी पंडित उमेश द्विवेदी (बंटी महाराज) कहते है कि अश्विनी मास के पूर्णिमा तिथि से पितृमोक्ष अमावस्या तक पिंडदान , तर्पण , श्राद्ध कर्म और ब्राम्हणों को भोजन से पूर्वज अति प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते है ।
नर्मदा मंदिर पुजारी पंडित धनेश द्विवेदी(वन्दे महाराज) बताते है कि शास्त्रों में वर्णित गंगा में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है लेकिन नर्मदा के दर्शन मात्र से मानव मोक्ष को प्राप्त करता है । नर्मदा नदी की इसी विशिष्ठता के कारण माँ नर्मदा तट स्थित अरंडी संगम में श्राद्ध , तर्पण कर्म करने से जीव , पितर मोक्ष को प्राप्त करता है ।

अरंडी संगम के केदार नाथ बताते है कि पितरों का तर्पण , पिंडदान व दशगात्र भी यंहा आकर लोग करते है । नर्मदा नदी के रामघाट उत्तर तट पर अस्थि विसर्जन भी किया जाता है व नर्मदा के अन्य तटों , स्थानों में लोग अपना कर्मकांड कराते रहते है ।
इस तरह अमरकंटक में पितृपक्ष में अर्पण , तर्पण , व समर्पण का बहुत पुण्य लाभ माना जाता है ।