अमरकंटक क्षेत्र में प्रतिवर्ष की भांति उत्साह से मनाया गया गोवर्धन पूजन का पर्व ।।

अमरकंटक :- श्रवण उपाध्याय
पवित्र नगरी अमरकंटक में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी अनेक वार्डो में लोगो ने गोवर्धन पूजन बड़े हर्सोल्लास के साथ मनाया । अमरकंटक के अनेक वार्डो में गोवर्धन पूजन की परंपरा को निभाते हुए देखा गया । धन तेरस के बाद नरक चौदस , दीपावली के अगले दिवस मनाया जाता है गोवर्धन पूजन । दीपो का पर्व यूं तो भगवान राम की घर वापसी और माता लक्ष्मी के पूजन के साथ मनाया जाता है । गोवर्धन पूजा वाले दिन भगवान कृष्ण की पूजा होती है , साथ ही गाय के गोबर की गोवर्धन देव् बनाकर उन्हें पूजने की परंपरा भी रही है । अन्नकूट / गोवर्धन पूजन भगवान के श्रीकृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारंभ हुई । इस दिन मंदिरों में छप्पन भोग व इससे भी ज्यादा खाद्य सामग्रियों का भोग लगाया जाता है । गोवर्धन पूजन सुबह व शाम दो समय किया जाता है ।

अमरकंटक निवासी शिवनाथ (नंदू) यादव बताते है इस दिन सुबह गाय के गोबर से घर आँगन को लीपपोत कर पवित्र किया जाता है ,ऐसा मान्यता है कि गोबर से आँगन लीपने से पवित्र हो जाता है । घर मे गोबर को पवित्र स्थान पर गोलाकार बनाकर रख दिया जाता है , फिर उसमें चंदन अक्षत डाल कर पूजन किया जाता है , धूप अगरबत्ती जलाकर गोवर्धन स्वरूप मान कर आरती पूजन किया जाता है । इस पूजन को यादव , रावत , कौराई के अलावा अन्य जाती के लोग भी करते है । यह मौन व्रत 12 वर्ष तक लोग करते है फिर बृन्दावन जाकर अपनी मान्यतानुसार पूजन पाठ कर व्रत की समाप्ति करते है ।

छोटू यादव , रामा यादव भी बातचीत में बताते है कि हमारे गावँ मंदरवानी क्षेत्र में सुबह से घर आँगन गोबर से लीपपोत कर गाय की पूजन किया जाता है । गाय को टीका चंदन कर आरती उतारी जाती है उसके बाद सभी गायों को फ्री छोड़ दिया जाता है , इस दिन जो गाय का चरवाहा होता है वह इस दिन चराने नही जाता । इस दिन अधिकतर लोग मौन ब्रत रखते है और शाम को जब गाय घर आ जाती है तब उनकी पुनः पूजन कर व्रत समाप्त करते है ।
अमरकंटक क्षेत्र में जन चर्चा पर पता चला कि यंहा भी लोग गाय की पूजन कर दंडवत प्रणाम करते हुए गाय के पैरों के बीचों बीच पांच बार निकलते है फिर शाम को गाय आ जाती है तब दो बार पुनः दंडवत प्रणाम करते हुए पैरों के बीच से निकलना पड़ता है । जो जो बच्चे बूढ़े मौन ब्रत रखते है उन्हें परिवार के लोग चंदन टिका लगाकर मालाएं पहनाते है , उन्हें बिदा करते है फिर वो सब एक साथ एक जगह पर गौ पूजन कर जंगल चले जाते है , इस बीच सभी व्रती लोग किसी से भी वार्तालाप नही करते । शाम को पुनः वापस घर आकर गौ पूजन करने के पश्चात अपना मौन व्रत छोड़ देते है । अपनी श्रद्धानुसार गोवर्धन जी का भोग भी लगाते है ।

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