जबलपुर के इस क्षेत्र में भगवान परशुराम ने किया था तप, आज भी मौजूद हैें प्रमाण, 3 मई को परशुराम जयंती जबलपुर रिपोर्टर विक्की राजपूत की खास रिपोर्ट

जबलपुर के इस क्षेत्र में भगवान परशुराम ने किया था तप, आज भी मौजूद हैें प्रमाण, 3 मई को परशुराम जयंती
अक्षय तृतीया का दिन वैसे तो बहुत ही मंगलकारी और अबूझ मुहूर्त वाला होता है। इसके साथ कई कथाएं व किवदंतियां जुड़ी हुई हैं। भगवान परशुराम का जन्मोत्सव भी इसी दिन मनाया जाता है। खासकर विप्र समाज अपने आराध्यदेव के जन्मोत्सव पर विविध आयोजन भी करता है। वैसे तो भगवान परशुराम से जुड़ी कथाएं व स्थान पूरे देश में कहे देखे व सुने जाते हैं। संस्कारधानी जबलपुर में भी भगवान परशुराम से जुड़ा एक ऐसा स्थान मौजूद है। ऐसी मान्यता है कि यहां भगवान तपस्या की थी। जब उन्हें पानी की आवश्यकता पड़ी तो स्वयं मां गंगा उनकी प्यास बुझाने के लिए प्रकट हो गईं थीं। यह स्थान आज भी लोगों की आस्था का केन्द्र बना हुआ है।
जबालि ऋषि के नाम से विख्यात जबलपुर संस्कारधानी भगवान परशुराम की तपोस्थली रही है। भगवान ने यहां सालों रहकर तपस्या की थी। वे जहां तपस्या किया करते थे, वहां कोई जल स्रोत नहीं था, ऐसे में मां नर्मदा वहां प्रकट हो गईं थीं। ये नर्मदा आज भी परशुराम कुंड के रूप में जानी जाती हैं। ये जनआस्था का महत्वपूर्ण स्थान भी है। प्रत्येक वर्ष परशुराम जयंती के अवसर यहां आस्थावानों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

कमंडल छोड़ा, नर्मदा स्वयं पहुंच गईं
लोक मान्यताओं के अनुसार जबलपुर जिले के खमरिया क्षेत्र स्थित मटामर गांव में भगवान परशुराम ने तपस्या की थी। वे प्रतिदिन प्रातः काल नर्मदा स्नान के लिए जाते थे। एक दिन वे रेवा स्नान कर रहे थे, तभी मां नर्मदा ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि भगवन आपको स्नान के लिए इतनी दूर तट आने की आवश्यकता नहीं है। आप अपना कमंडल यहा छोड़ जाइये मैं आपकी तपोस्थली में बने कुंड में स्वयं अवतरित हो जाऊंगी। दूसरे दिन भगवान परशुराम जब कुंड के समीप गए तो उन्हें वह कमंडल कुंड में मिला। तब से इस कुंड का नाम परशराुम कुंड पड़ गया। आज भी यह मान्यता है कि कुंड का जल नर्मदा जल के समान है, क्योंकि मां नर्मदा स्वयं इसमें वास करती हैं।

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