उदासीनता ( वृद्धा अवस्था में प्राप्त एकाकीपन बहुत कुछ कह जाता है)

बालकृष्ण तिवारी चेयरमैन bsp24news
उदासीनता ( वृद्धा अवस्था में प्राप्त एकाकीपन बहुत कुछ कह जाता है)

त्योंहार के बाद बच्चों के वापस काम पर लौट जाने के बाद आज “अम्मा” सुबह से ही चुप बैठी रही, जैसे उसको कोई काम ही नहीं था।
बाबूजी उनको देखकर सहज भाव से यकायक बोले” क्यों कैसे बैठी हो शांति से ???? अम्मा कुछ कह पाती, बाऊजी का तुरंत दूसरा सबाल।
आज ठाकुर जी का स्नान नहीं कराना है, क्या जल्दी नहीं है तुम्हें काम की। अम्मा बोली क्यों बैठे हुए मैं तुमको भाती नही क्या ????
बाबूजी ने सोचकर जवाब दिया नहीं ऐसी कोई बात नहीं। अक्सर तुम काम करती रहती हो तो, लगता है “घर चल रहा है” सब ठीक है, पर तुम्हें ऐसा शांत बैठे देख कर कुछ अजीब लग रहा है मानों सब कुछ रुक गया हो।

आज ” अम्मा ” कुछ अलग ही रूप में थी, उन्होंने उन्हें तुरंत जवाब दिया, आपको आपका नाश्ता मिल जाएगा। मैं अपना काम कैसे करती हूं, आप अब ज्यादा चिंता ना किया करो मुझे मेरे ठाकुर जी का आशीर्वाद प्राप्त है।( थोड़ा चिड़चिड़ा स्वभाव हो रहा था आज)।
बाबूजी उनकी प्रतिक्रिया देखकर तुरंत समझ गए कि यह, तो बुढ़ापे की निशानी है शायद। जो जंग के मैदान की तरह घर का काम फतेह कर अन्य काम भी कर लेती थी, वह महिला आज शांति से बैठी है जैसे उसे कोई काम की जल्दी ही नहीं। मन ही मन बाबूजी सोच रहे थे, की शायद उन्हें एकांतवास मोन की ओर ले जा रहा है।
धीमे से स्वर में बाबूजी ने उनके कंधे पर हाथ रखा और बोले “” मैं हूं ना “” तुम्हारे साथ , आज तुम्हारा काम मैं कर लूंगा। बताओ क्या करना है। अम्मा फिर चिढ़ – चिढ़ाते, हुए बोली जाओ तुम्हें कोई काम नहीं आता। तुम शांति से एक कोने में बैठे रहो एक काम करोगे और 4 बिगाड़ दोगे मैं धीरे-धीरे सब कर लूंगी, अभी मेरा समय ही कहां हुआ है। प्रातः जल्दी उठ जाती हूं, तुमसे तो पहिले ही सब कर लेती हूं । बस आज कुछ मन सही नहीं है मेरा।इसलिए ही बैठी हूं।
बाबूजी कुछ सोच कर फिर बोले अच्छा कम से कम एक कप चाय और पिला दो, फिर मैं थोड़ा टहल के आता हूं। तुम जब तक धीरे धीरे कर लेना जो तुम्हें करना है मैं कुछ नहीं कहूंगा। यह सुनकर ” अम्मा ” चाय बना लाई और बाबूजी पीकर टहलने को निकल गए।

बाबूजी जब टहल कर वापस आए तो उनके हाथ में, एक पिंजरा था जिसके अंदर छोटे-छोटे दो तोते, अपनी मीठी मीठी जुबान से तोताराम तोताराम कह रहे थे। अम्मा उनको देखकर एकदम से बहुत खुश हुई, मानो उनकी चेहरे की चमक वापस आ गई। वह बोली तुमने इतने सालों में, तो मुझे कुछ अच्छा खास लाकर नहीं दिया आज अचानक से यह तुम्हें क्या हुआ है। बाबूजी ने जवाब दिया कि मुझ पर तुम्हारा उदास चेहरा देखा नहीं गया, मैं सब समझता हूं।
जिसने इतना गृहस्थी संभाली हो, वह एकदम से अकेले हो जाए तो आखिर उसका मन कहां लगने वाला है। अब तुम इन्हीं के साथ अपना समय बिताया करो यह मेरी तरफ से तुम्हें उपहार रहा।
” बाबूजी ” समझ चुके थे कि एकाकीपन के कारण उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हो रहा है। इसीलिए उन्होंने उनको ऐसा तोहफा देने की सोचा, ताकि उनका ध्यान लगा रहे। आखिर उदासीनता का एक कारण वृद्ध अवस्था में प्राप्त होने बाला अकेला पन भी है।।

प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका )
ग्वालियर मध्य प्रदेश

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