अमरकंटक : श्रवण उपाध्याय (पत्रकार)
हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म मे बड़ा व सौभाग्य का व्रत माना जाता है । यह तीज का त्योहार भाद्रपद मास शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता है ।
हरतालिका तीज में भगवान शिव , माता गौरी , गणेश , नंदी , मूषक मिट्टी से बना कर फुलेहरा झुला के नीचे रख पंडितों से विधि विधान से पूजन कराया जाता है । यह व्रत निर्जला व निराहार किया जाता है । शिव जैसा पति पाने के लिए कुआंरी कन्याएं भी व्रत रख निराहार रहकर पूजन करती है ताकि मन चाहे वर मिल सके ।

इस दिन निर्जला व्रत रख रात्रि जागरण भी किया जाता है । पूजन के पहले सभी महिलाएं सज धज कर तैयार होती है फिर एक निश्चित स्थल पर पूजन करने पहुंचती है जंहा कई जगह काफी महिलाएं एकत्रित होती है ।पूजन हेतु पूरी तैयारी के साथ आती है , पूजन विधि विधान से पंडित करवाते है । इसी जगह पूरी रात्रि पूजन उपरांत भजन व गीत गाकर महिलाएं जागरण करती है । सुबह 4 बजे के बाद स्नान कर पुनः पूजन स्थल पर आरती कर शिव पार्वती का सिंघासन हिलाया जाता है और फुलेहरा झूला उतार कर पवित्र जल में सेरा(डाल) दिया जाता है ।

इस तरह माँ नर्मदा जी की उद्गम स्थळी अमरकंटक में भी खूब तीज का त्योहार मनाते देखा गया । लगभग घरों में यह नजारा देखने को मिला । हर घर मे फुलेहरा झूला नही बांधते लेकिन आस पास किसी एक घर मे फुलेहरा बांध सब मिलकर पूजन किया जाता है । आस पास की महिलाएं एकत्रित होकर साथ मे पूजन कर रात्रि जागरण करती है । भजन कीर्तन करने का आनंद प्राप्त करती है । एक जगह ज्यादा लोग होने से रात्रि जागरण में आसानी भी हो जाती है । इस तरह हरतालिका तीज का व्रत रख महिलाएं पूजन कर पति की लंबी उम्र की कामना करती है व कुँआरी कन्याएं अच्छे वर (शिव जैसा) की मनोकामना कर पूजन का विसर्जन करती है ।